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📅 Published on Friday, June 12, 2026

सरकार फ़िलहाल नहीं बढ़ाएगी इथेनॉल मिश्रण की अनिवार्यता: पुरानी गाड़ियों का माइलेज घटने और इंजन ख़राब होने की आशंका, फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को मिलेगा बढ़ावा


नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को तत्काल E20 (20 प्रतिशत) से बढ़ाकर E25 (25 प्रतिशत) या उससे अधिक करने की योजना पर फ़िलहाल ब्रेक लगाने का संकेत दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश की सड़कों पर पहले से मौजूद करोड़ों ऐसे वाहन हैं, जो उच्च इथेनॉल मिश्रण को संभालने के लिए तकनीकी रूप से तैयार नहीं हैं। सरकार अब अनिवार्य मिश्रण बढ़ाने के बजाय फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को प्रोत्साहित करने और उपभोक्ताओं को अपनी गाड़ी के अनुसार ईंधन चुनने की आज़ादी देने की नीति पर आगे बढ़ रही है।


क्यों उठ रहा है पुरानी गाड़ियों पर ख़तरा?

ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और उद्योग जगत के वरिष्ठ अधिकारियों का स्पष्ट मत है कि भारत में अधिकांश मौजूदा पेट्रोल वाहन E20 ईंधन के लिए भी पूरी तरह अनुकूलित नहीं हैं। नीति आयोग की 2021 में जारी E20 रोडमैप रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2023 से पहले निर्मित सभी कारें और दोपहिया वाहन केवल E10 (10 प्रतिशत इथेनॉल) ईंधन के लिए डिज़ाइन और प्रमाणित किए गए थे। अप्रैल 2023 से मार्च 2025 के बीच उत्पादित वाहन E20 मटेरियल-कम्प्लायंट हैं, यानी उनके इंजन, रबर पार्ट्स और फ्यूल लाइनें 20 प्रतिशत तक इथेनॉल सहन कर सकती हैं, लेकिन उनका ईंधन प्रबंधन सिस्टम पूरी तरह E20 के लिए कैलिब्रेटेड नहीं है। केवल अप्रैल 2025 के बाद बिकने वाले वाहन ही पूर्ण रूप से E20-कम्प्लायंट हैं।


यदि सरकार अचानक E25 या इससे अधिक मिश्रण अनिवार्य कर देती है, तो मार्च 2023 से पहले के वाहनों में माइलेज में भारी गिरावट आएगी। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, E10 के लिए डिज़ाइन किए गए लेकिन E20 पर चलाए जाने वाले वाहनों में 1-2 प्रतिशत तक ईंधन दक्षता कम हो सकती है, हालाँकि उपभोक्ताओं का कहना है कि वास्तविक गिरावट इससे कहीं अधिक होती है। E25 या E30 पर तो यह नुकसान और बढ़ जाएगा। इसके अतिरिक्त, इंजन ऑयल का पतला होना, धातु के पुर्जों का क्षरण और फ्यूल इंजेक्टर का बंद होना जैसी समस्याएँ पुरानी गाड़ियों के रखरखाव का खर्च बढ़ा देंगी, जिसका सीधा असर मध्यम वर्ग और छोटे वाहन मालिकों पर पड़ेगा।


क्या है सरकार की तैयारी? 

हालाँकि सरकार ने E22, E25, E27 और E30 (30 प्रतिशत इथेनॉल) तक के ईंधन मानकों पर काम शुरू कर दिया है, लेकिन यह प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है। E25 वाहनों के परीक्षण अभी आरंभ होने हैं और इनमें कम से कम एक-दो वर्ष का समय लग सकता है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी नीति बनाने की है, जिसमें न तो पुराने वाहन मालिकों पर अचानक आर्थिक बोझ पड़े और न ही इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की रफ़्तार धीमी हो।


फ्लेक्स-फ्यूल वाहन: भविष्य का रास्ता

ऑटो उद्योग ने सरकार को स्पष्ट सुझाव दिया है कि विभिन्न ग्रेड के अनिवार्य मिश्रण लागू करने के बजाय फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ये वाहन E20 से लेकर E85 (85 प्रतिशत इथेनॉल) तक किसी भी मिश्रण पर बिना किसी संशोधन के चल सकते हैं। मारुति सुजुकी और हीरो मोटोकॉर्प पहले ही अपने फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल लॉन्च करने की कगार पर हैं, जबकि अन्य वाहन निर्माता भी अपनी योजनाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पेट्रोल पंपों पर E20 और उच्च मिश्रण वाले ईंधन के लिए अलग-अलग डिस्पेंसर लगाए जाने चाहिए। इससे वाहन मालिकों को यह स्वतंत्रता मिलेगी कि वे अपनी गाड़ी की तकनीकी क्षमता के अनुरूप ईंधन का चयन कर सकें। सरकार ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए E85 ईंधन की कीमत दिल्ली में ₹82.12 प्रति लीटर निर्धारित कर दी है, जिससे वैकल्पिक ईंधन की ओर रुझान बढ़ सकता है।



गन्ना उत्पादक राज्यों का राजनीतिक समीकरण

इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी गन्ना किसान और चीनी उद्योग हैं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में इथेनॉल की माँग बढ़ने से किसानों की आय में सुधार होता है और चीनी मिलों को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होता है। शक्तिशाली चीनी लॉबी लगातार उच्च इथेनॉल मिश्रण की पैरवी कर रही है, और यह मुद्दा इन राज्यों में राजनीतिक रूप से भी आकर्षक है। हालाँकि, केंद्र सरकार को खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन बनाना है। यदि गन्ने की फसल प्रभावित होती है या चीनी की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार को इथेनॉल उत्पादन पर नियंत्रण लगाना पड़ सकता है, जैसा कि पहले भी किया जा चुका है।


क्या होगा आगे?

फिलहाल, सरकार कोई जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेना चाहती। मौजूदा संकेतों के अनुसार, उच्च इथेनॉल मिश्रण को फिलहाल अनिवार्य बनाने के बजाय स्वैच्छिक और चरणबद्ध तरीके से अपनाने की रणनीति पर काम होगा। ऑटो उद्योग, तेल विपणन कंपनियाँ और कृषि क्षेत्र — सभी की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित नीति की आवश्यकता है, जो न तो पर्यावरणीय लक्ष्यों से समझौता करे और न ही आम नागरिकों पर अनावश्यक वित्तीय दबाव डाले।